Tuesday, March 9, 2010

क्या सचमुच लालू-मुलायम-मायावती महिला आरक्षण के विरोधी हैं और भाजपा-काँग्रेस सबसे बड़े महिला हितैषी?

महिला आरक्षण बिल के सन्दर्भ में कठफोड़वा और मोहल्ला ब्लॉग पर हमारे पुराने साथी अजय ने महत्वपूर्ण बहस शुरु की है । उन्होंने यह रेखांकित किया है कि पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए अलग कोटा देने की माँग को मीडिया में महिलाओं को मिल रहे आरक्षण में अड़ँगा डालने जैसी चीज़ के रूप में पेश किया जा रहा है । यह एक जरूरी सवाल है जिसपर खुलकर बात होनी चहिए ।

अजय की पोस्ट पर मैने जो टिप्पणी की उसे यहाँ रख रहा हूँ -

काँग्रेस और भाजपा जहां इस बहस को डाउनप्ले कर रहें हैं और यूथ फॉर इक्वालिटी जैसे 'अराजनीतिक' संगठन इस पर चुप्पी साधे हैं, वहीँ वामपंथी सिद्धांतकार सारी महिलाएं दलित हैं जैसे मुहावरे गढ़ने में शायद सबसे आगे हैं.

निवेदिता मेनन ने लगभग एक साल पहले इस पर बहस चलाई थी, जिसके जवाब में कविता कृष्णन ने यह कहा कि संसद में आरक्षण इस अर्थ में भिन्न है कि यहाँ 'मेरिट' जैसी कोई चीज नहीं चलती बल्कि अंततः सामाजिक गोलबंदी से अवसरों का फैसला होता है. और चूंकि ओबीसी राजनीतिक तौर पर एक गोलबंद है, जैसा कि संसद में आरक्षण के बगैर भी 27% से ज़्यादा ओबीसी सांसद पहुँचने से ज़ाहिर होता है, अगर बिना अलग कोटे के भी आरक्षण दिया जाय, तो भी ओबीसी महिलाएं अपने अनुपात में स्वाभाविक तौर पर आयेंगी.

कुछ ऐसा ही अफलातून जी ने भी लिखा हैं ।

लेकिन मुझे अभी भी यह तर्क साफ़ समझ में नहीं आया. अगर जनसंख्या की वजह से ओबीसी सीधे ही अच्छी तादाद में संसद में आ गए बिना आरक्षण, तो औरतों को भी उनकी आधी आबादी की ताकत के भरोसे ही क्यों न छोड़ दिया जाए. और अगर हम यह कहते हैं कि औरतों को नहीं छोड़ सकते क्योंकि औरतें राजनीतिक रूप से गोलबंद कौम नहीं हैं, तो फिर ओबीसी औरतों को भी क्यों छोड़ा जाय.

दिलीप मंडल जी का क्रीमी लेयर वाला सवाल भी वाजिब और ज़रूरी है.

4 comments:

अफ़लातून said...

ब्लॉग अच्छा लगा . सातत्य बनाये रखिएगा.

Archana said...

This entire business has nothing to do with women's empowerment, but more to do with vote bank politics and doing political business for one's own selfish interests.

One, I don't understand the logic of arbitrarily deciding at 33% as a figure for reservation. If these so-called leaders - be they right-wing, left-wing, centrist or any other kind of oriented people - really want to reserve positions for women for their empowerment, they should reserve 50% for women since that is the ration of women in the human population. Besides, they should reserve 50% positions not only in politics but also in education and jobs.

Otherwise, let them not talk about any reservation, I have no problem with that.

Two, they need not be patronising by saying they are throwing away crumbs to the women by 33% reservation in politics and Lalu and Co. need not be extra patronising by saying he wants a cut for the OBCs etc out of this 33%. Lalu and Co should first set their own records straight then talk about any kind of social justice.

I am not in favour of Lalu or his opponenst. Please don't take my remarks as critiquing Lalu and co specifically.

Archana said...

I am not in favour of his opponents either. Basically all of them are degraded hypocrites who are eating into the resources of this country and finding new ways of serving their ends.

Suman said...

nice